प्रयोगशाला में विकसित हीरे: खनन किए गए हीरों का एक सतत विकल्प

पाठ्यक्रम: जीएस-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी/पर्यावरण

सन्दर्भ

  • प्रयोगशाला में विकसित हीरे (Lab-grown Diamonds), खनन किए गए प्राकृतिक हीरों के एक सतत विकल्प के रूप में उभर रहे हैं।

परिचय

  • विश्व की कुछ सबसे बड़ी हीरा खदानें, जैसे ऑस्ट्रेलिया की आर्गाइल (Argyle) खदान तथा कनाडा की डायाविक (Diavik) खदान, हाल के वर्षों में लगभग समाप्ति (Exhaustion) की स्थिति में पहुँच गई हैं।
  • यह कमी वर्ष-दर-वर्ष बढ़ती गई है और वर्तमान में हीरा उत्पादन कई दशकों के सबसे निम्न स्तर पर पहुँच गया है।
  • अनुमान है कि वैश्विक उत्पादन का 90% प्रदान करने वाली 40 हीरा खदानों, जो बोत्सवाना, रूस तथा अन्य देशों में स्थित हैं, की शेष आयु 50 वर्ष से अधिक नहीं है।

हीरा खनन से जुड़ी चिंताएँ

  • पर्यावरणीय चिंताएँ: हीरा खनन में अत्यधिक मात्रा में जल एवं ऊर्जा की आवश्यकता होती है तथा इससे आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर क्षति पहुँचती है।
  • यह प्रायः वनों की कटाई, विस्थापन, मृदा अपरदन तथा जल प्रदूषण से जुड़ा होता है।
  • विशाल खुली खदानों (Open-pit Excavations) के कारण भूस्खलन एवं मिट्टी के धंसाव (Mudslides) का भी खतरा बढ़ जाता है।
  • स्वास्थ्य संबंधी जोखिम: हीरा खदानों में कार्य करने वाले श्रमिक अनेक प्रकार की बीमारियों से प्रभावित होते हैं।
  • वर्ष 2011 के एक अध्ययन के अनुसार, श्रमिकों में एस्बेस्टस (Asbestos) के संपर्क का जोखिम होता है, जिससे एस्बेस्टोसिस (Asbestosis), प्ल्यूरल प्लाक (Pleural Plaques) तथा मेसोथेलियोमा (Mesothelioma) जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं।
  • ब्लड डायमंड (Blood Diamonds): ये ऐसे खनन किए गए हीरे हैं, जिनकी अवैध बिक्री से प्राप्त धन का उपयोग सशस्त्र संघर्ष एवं सैन्य गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए किया जाता है। किसी हीरे की भौगोलिक उत्पत्ति का पता लगाना लगभग असंभव होता है।
  • यद्यपि संघर्ष-मुक्त हीरों के सत्यापन हेतु किम्बरली प्रक्रिया (Kimberley Process) प्रारंभ की गई थी, फिर भी नियामकीय कमियों के कारण ब्लड डायमंड की तस्करी अब भी जारी है।
  • कार्बन पदचिह्न (Carbon Footprint): कोयला-आधारित विद्युत ग्रिड से निर्मित हीरों में कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से निर्मित हीरों का कार्बन पदचिह्न अपेक्षाकृत बहुत कम होता है।

विकल्प के रूप में प्रयोगशाला में विकसित हीरे

  • प्रथम प्रमाणित कृत्रिम हीरों का निर्माण जनरल इलेक्ट्रिक (GE) ने 1954 में “प्रोजेक्ट सुपरप्रेशर” के अंतर्गत किया था।
  • इसमें उच्च दाब–उच्च तापमान (HPHT) प्रक्रिया का उपयोग किया गया, जो पृथ्वी के मैंटल में प्राकृतिक हीरों के निर्माण की परिस्थितियों की नकल करती है।
  • प्रयोगशाला में विकसित हीरे रासायनिक, भौतिक तथा प्रकाशीय (Optical) गुणों की दृष्टि से प्राकृतिक हीरों के समान होते हैं।
  • संघटन (Composition): शुद्ध कार्बन।
  • क्रिस्टलीय संरचना: प्राकृतिक हीरों के समान घनीय (Cubic) क्रिस्टल जालक।
  • इनका निर्माण मुख्यतः रासायनिक वाष्प निक्षेपण (Chemical Vapour Deposition – CVD) तथा उच्च दाब–उच्च तापमान (HPHT) तकनीकों से किया जाता है।

HPHT (उच्च दाब–उच्च तापमान)

  • यह पृथ्वी के मैंटल जैसी परिस्थितियों का अनुकरण करती है।
  • इसमें कार्बन को अत्यधिक दाब एवं तापमान के अधीन रखकर हीरे का निर्माण किया जाता है।

CVD (रासायनिक वाष्प निक्षेपण)

  • मीथेन जैसी कार्बन-समृद्ध गैस को निर्वात (Vacuum) कक्ष में विघटित किया जाता है।
  • कार्बन परमाणु डायमंड सीड क्रिस्टल (Diamond Seed Crystal) पर परत-दर-परत जमा होते जाते हैं।

प्राकृतिक हीरों से अंतर

  • प्राकृतिक हीरों में नाइट्रोजन की अल्प मात्रा पाई जाती है, जबकि प्रयोगशाला में विकसित हीरे नाइट्रोजन-मुक्त होते हैं।
  • प्रयोगशाला में विकसित हीरे पर्यावरण-अनुकूल एवं संघर्ष-मुक्त (Conflict-free) होते हैं। खनन किए गए हीरों के विपरीत, जिनके लिए लगभग 250 टन मिट्टी हटानी पड़ती है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, ये कम जल एवं ऊर्जा का उपयोग करते हैं।

प्रयोगशाला में विकसित हीरों का बाज़ार

  • 2024 तक विश्व के लगभग 90% हीरों का प्रसंस्करण भारत में होता है, जो मूल्य के आधार पर वैश्विक कारोबार का लगभग 75% है।
  • अनुमान है कि 2024 में वैश्विक हीरा बाज़ार में 12% हिस्सेदारी रखने वाला प्रयोगशाला में विकसित हीरों का बाज़ार 2029 तक बढ़कर 16% हो जाएगा।
प्रयोगशाला में विकसित हीरों का बाज़ार

निष्कर्ष

  • प्रयोगशाला में विकसित हीरे संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों की ओर संक्रमण तथा अधिक सतत विनिर्माण प्रक्रियाओं पर बल देते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, हीरा उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के सिद्धांतों को भी सुदृढ़ करता है, जिसमें संसाधनों का अधिक दक्षता से उपयोग किया जाता है तथा उत्पाद के पूरे जीवनचक्र में पर्यावरणीय प्रभावों को न्यूनतम रखा जाता है।

स्रोत: TH

 

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